(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.92. अध्यायः 092
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति वामदेवसुमनस्संवादानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-92-0x(5581)(68398)
कथं धर्मे स्थातुमिच्छन्राजा वर्तेत भारत।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह॥ 12-92-1(68399)
भीष्म उवाच। 12-92-2x(5582)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
गीतं दृष्टार्थतत्त्वेन वामदेवेन धीमता॥ 12-92-2(68400)
राजा वसुमना नाम कौसल्यो बलवाञ्शुचिः।
महर्षि परिपप्रच्छ वामदेवं तपस्विनम्॥ 12-92-3(68401)
धर्मार्थसहितैर्वाक्यैर्भगवन्ननुशाधि माम्।
येन वृत्तेन वै तिष्ठन्न च्यवेयं स्वधर्मतः॥ 12-92-4(68402)
तमब्रवीद्धामदेवस्तेजस्वी तपतां वरः।
हेमवर्णं सुखासीनं ययातिमिव नाहुषम्॥ 12-92-5(68403)
वामदेव उवाच। 12-92-6x(5583)
धर्ममेवानुवर्तस्व न धर्माद्विद्यते परम्।
धर्मे स्थिता हि राजानो जयन्ति पृथिवीमिनाम्॥ 12-92-6(68404)
अर्थसिद्धेः परं धर्मं मन्यते यो महीपतिः।
वृद्ध्यां च कुरुते बृद्धिं स धर्मेण विराजते॥ 12-92-7(68405)
अधर्मदर्शी यो राजा बलादेव प्रवर्तते।
क्षिप्रमेवापयातोऽस्मादुभौ प्रथममध्यमौ॥ 12-92-8(68406)
असत्पापिष्ठसचिवो वध्यो लोकस्य धर्महा।
सहैव परिवारेण क्षिप्रमेवावसीदति॥ 12-92-9(68407)
अर्थानामननुष्ठाता कामचारी विकत्थनः।
अपि सर्वां महीं लब्ध्वा क्षिप्रमेव विनश्यति॥ 12-92-10(68408)
अथाददानः कल्याणमनसूयुर्जितेन्द्रियः।
वर्धते मतिमान्राजा स्रोतोभिरिव सागरः॥ 12-92-11(68409)
न पूर्णोऽस्मीति मन्येत धर्मतः कामतोऽर्थतः।
बुद्धितो मन्त्रतश्चापि सततं वसुधाधिप॥ 12-92-12(68410)
एतेष्वेव हि सर्वेषु लोकयात्रा प्रतिष्ठिता।
एतानि शृण्वँल्लभते यशः कीर्ति श्रियं प्रजाः॥ 12-92-13(68411)
एवं यो धर्मसंरम्भी धर्मार्थपरिचिन्तकः।
अर्थान्परीक्ष्यारभते स ध्रुवं महदश्नुते॥ 12-92-14(68412)
अदाता ह्यनभिस्नेहो दण़्डेनावर्तयन्प्रजाः।
साहसप्रकृती राजा क्षिप्रमेव विनश्यति॥ 12-92-15(68413)
अथ पापं कृतं बुद्ध्या न च पश्यत्यबुद्धिमान्।
अकीर्त्याऽभिसमायुक्तो भूयो नरकमश्नुते॥ 12-92-16(68414)
ततो न याचितुर्दातुः शुक्लस्य रसवेदिनः।
व्यसनं स्वमिवोत्पन्नं विजिघांसन्ति मानवाः॥ 12-92-17(68415)
यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्यानपि पृच्छति।
सुखतन्त्रोऽर्थलाभेषु न चिरं सुखमश्नुते॥ 12-92-18(68416)
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता।
धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्नुते॥ ॥ 12-92-19(68417)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वमि राजधर्मपर्वणि द्विनवतितमोऽध्यायः॥ 92॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-92-8 उभौ धर्मार्थौ॥ 12-92-9 असन्तो दुष्टाः॥ 12-92-13 एतेषु धर्मादिषु॥


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